भजन 142:4 में दाऊद राजा ने अपने अकेलेपन और संकट की अवस्था में कहा, "मैं ने अपनी दाहिनी ओर दृष्टि की, परन्तु मुझे कोई देखने वाला न था; मेरे लिये कोई शरण न थी; मेरी प्राण की सुध लेने वाला कोई न था।" यह वचन हमें इस संसार की सच्चाई दिखाता है कि बहुत बार लोग आत्मिक चिंता नहीं करते, न अपनी आत्मा की, न दूसरों की। परंतु परमेश्वर, प्रभु यीशु मसीह, पवित्र आत्मा, स्वर्गदूत, और यहां तक कि नरक में रहने वाले भी आत्मा की चिंता करते हैं। आइए इस विषय को विस्तार से समझें।
1. परमेश्वर पिता चिंता करता है (यशायाह 45:22)
परमेश्वर पिता ने मनुष्यों के उद्धार की चिंता की, इसीलिए वह हमें बुलाता है, "धरती के सब दूर-दराज के लोगों, मेरी ओर फिरो और उद्धार पाओ, क्योंकि मैं ही परमेश्वर हूं और दूसरा कोई नहीं।" परमेश्वर चाहता है कि हर व्यक्ति उसकी ओर मुड़े और शाश्वत जीवन पाए।
2. प्रभु यीशु मसीह चिंता करता है (मरकुस 10:45; 1 तीमुथियुस 1:15)
प्रभु यीशु ने अपनी चिंता को अपने कार्यों से साबित किया। मरकुस 10:45 में लिखा है कि "क्योंकि मनुष्य का पुत्र इसलिये नहीं आया कि उसकी सेवा टहल की जाए, परन्तु इसलिये कि आप सेवा टहल करे और बहुतों के बदले अपने प्राण दे।" 1 तीमुथियुस 1:15 बताता है कि "मसीह यीशु पापियों को उद्धार देने के लिये जगत में आया।" यह स्पष्ट करता है कि यीशु ने हमारे उद्धार की चिंता की और अपने बलिदान से इसका प्रमाण दिया।
3. पवित्र आत्मा चिंता करता है (उत्पत्ति 6:3; प्रकाशित 22:17)
उत्पत्ति 6:3 में परमेश्वर कहते हैं, "मेरा आत्मा सदा मनुष्य से वाद-विवाद करता न रहेगा।" इसका अर्थ है कि पवित्र आत्मा मनुष्यों को पाप से बचाने के लिए बार-बार सचेत करता है। प्रकाशित 22:17 में लिखा है, "आत्मा और दुल्हिन कहती है, आ।" यह हमें बुलाहट देता है कि जो प्यासा है, वह जीवन के जल को मुफ्त में ग्रहण करे।
4. स्वर्गदूत चिंता करते हैं (लूका 15:7,10)
लूका 15:7 कहता है, "मैं तुम से कहता हूं कि इसी रीति से स्वर्ग में एक मन फिराने वाले पापी के लिये उन निन्न्यानवे धर्मियों की अपेक्षा, जिन्हें मन फिराने की आवश्यकता नहीं, अधिक आनंद होगा।" लूका 15:10 में भी यही सत्य प्रकट होता है कि स्वर्गदूत प्रत्येक पश्चाताप करने वाले पापी के लिए आनंदित होते हैं।
5. जो लोग अधोलोक में हैं वे चिंता करते हैं (लूका 16:27,28)
लूका 16:27-28 में धनी व्यक्ति, जो अधोलोक में पीड़ा में था, अब्राहम से विनती करता है कि उसके भाइयों को सचेत किया जाए ताकि वे इस दुखदायी स्थान में न आएं। यह दर्शाता है कि नर्क में रहने वाले भी आत्मा के बारे में चिंता करते हैं, लेकिन तब बहुत देर हो चुकी होती है।
6. चार मित्रों ने चिंता की (मरकुस 2:1-12)
मरकुस 2:1-12 में चार मित्रों ने एक लकवे के मारे व्यक्ति को यीशु के पास लाने के लिए छत तक तोड़ डाली। उनका विश्वास और चिंता इतनी गहरी थी कि वे किसी भी कठिनाई को सहन करने के लिए तैयार थे।
7. किसी ने मेरी चिंता की (1 कुरिन्थियों 9:16)
प्रेरित पौलुस कहते हैं, "यदि मैं सुसमाचार सुनाऊं, तो मुझे घमण्ड की बात नहीं; क्योंकि यह तो मेरे लिये आवश्यक है, और यदि मैं सुसमाचार न सुनाऊं, तो मुझ पर हाय!" यह बताता है कि प्रेरितों और सेवकों को आत्मा की चिंता करनी चाहिए और लोगों तक परमेश्वर का वचन पहुंचाना चाहिए।
निष्कर्ष
यह स्पष्ट है कि परमेश्वर, प्रभु यीशु, पवित्र आत्मा, स्वर्गदूत, अधोलोक में रहने वाले, और विश्वासयोग्य सेवक सभी आत्मा की चिंता करते हैं। लेकिन क्या हम अपनी आत्मा और दूसरों की आत्मा की चिंता करते हैं? यदि नहीं, तो हमें इसे गंभीरता से लेने की आवश्यकता है। हमें अपने उद्धार और दूसरों के उद्धार के लिए प्रयास करना चाहिए, क्योंकि यही परमेश्वर की इच्छा है। आइए हम आत्मिक चिंता के महत्व को समझें और दूसरों तक परमेश्वर के प्रेम और उद्धार का संदेश पहुंचाएं।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें